आज सोशल मीडिया और टेलीविजन के युग में चुनावी घोषणाएं मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती हैं, लेकिन पहले ऐसा नहीं था। संचार साधनों के अभाव में चुनाव संबंधी सूचनाएं लोगों तक पहुंचाने के लिए डुगडुगी, ढोल और माइकिंग का सहारा लिया जाता था।
जिले के बुजुर्गों ने उस दौर की यादें साझा कीं, जब सोशल मीडिया और टेलीविजन नहीं थे। कुछ चुनिंदा रईस लोगों के पास ही रेडियो होता था, जिसे सुनने के लिए सैकड़ों लोग एक घर में जमा होते थे और समाचारों से अवगत होते थे।
खगड़िया में 85 वर्षीय सुरेंद्र प्रसाद चौधरी ने बताया कि उनका जन्म 1942 का है। उनके समय में सोशल मीडिया या टेलीविजन नहीं था। गांव में पार्टी से जुड़े लोग घूम-घूमकर बताते थे कि कौन सी पार्टी से कौन उम्मीदवार है और चुनाव कब होना है। माइकिंग के जरिए भी लोगों को चुनावी जानकारी दी जाती थी।
93 वर्षीय दशरथ दास ने बताया कि उस समय आज जैसा माहौल नहीं था। पहले डुगडुगी बजाकर लोगों को चुनावी सूचना दी जाती थी।
उन्होंने वोट की गिनती के बारे में भी बताया कि यह आज की तरह नहीं होती थी। सभी उम्मीदवारों से जुड़े व्यक्ति सजग रहते थे। अगर किसी को शौचालय भी जाना होता था, तो पुलिस साथ आती थी और वापस अपनी जगह पर छोड़ देती थी। इसका मतलब था कि कोई भी व्यक्ति कोई हरकत नहीं कर सकता था, जो अब ऐसा नहीं होता है।
66 वर्षीय अरुण दास ने बताया
अरुण दास ने बताया पहले बड़ी समस्या थी जब नेता क्षेत्र में घूमने लगता था तब पता चलता था कि अब चुनाव होना है तो नेता लोग ही बताते थे कि चुनाव की तारीख क्या है साथ ही कौन सा उम्मीदवार किस दल से खड़ा है। डुगडुगी और भोपू बजाया जाता था। चुनावी घोषणा से लोगों को अवगत कराने के लिए हैंड माइक जिसे भोपू कह सकते हैं उसे लेकर गांव-गांव लोग घूमते थे और लोगों को चुनावी तारीख और उससे जुड़े उम्मीदवारों के बारे में बताया जाता था। बड़ी मुश्किल होती थी आज का दौर तो काफी बेहतर है।
70 वर्षीय मंटू चौधरी ने क्या कहा
मंटू चौधरी ने बताया लोग सूचनाओं को एक दूसरे से आदान प्रदान किया करते थे। गांव में कुछ एक लोगों के पास रेडियो हुआ करता था जब चुनाव का समय आता था एक-एक रेडियो के पास 50 से 100 लोग जमा होकर समाचार सुनकर चुनावी खबर लेते थे।

